'माँ' पर कविता लिखना

‘माँ’ पर कविता लिखना
मेरे लिए
उतना ही दुरूह है
जितना पानी पर चलना..

क्योंकि
मैंने माँ की चिन्ताओ की
कभी परवाह नही की..

वह किस सोच में बैठी रहती है
सुबह-शाम
कभी जानने की कोशिश नही की..

माँ का जन्म देना
मुझे

सपना सजोंनाँ कि
बड़ा होकर
मेरे और बाबा ख्याल रखेंगा
बहुत

कभी सच होता नही लगने दिया
मैंने उन्हें..
– रवीन्द्र भारद्वाज
ग्रा. कटाई, पो.इन्दुपुर, जि. देवरिया (उत्तर प्रदेश)

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