माँ दुर्गा के दोहे

माँ दुर्गा के दोहे
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रक्तिम साड़ी तन सजे,गुड़हल हार सुहाय।
मस्तक मुकुट बिराजता, शोभा भक्त लुभाय।।

सवा रुपैया नारियल, रोली अक्षत हाथ।
हलुआ पूड़ी भोग ले, माँ को पूजें साथ।।

अंबे सिंह पर राजति,दुर्गा काली रूप।
उनको आदर भाव से पूजें नर अरु भूप।।

माँ की महिमा है भली, हरती दुख संताप।
भक्तों की मुश्किल टरे, स्वयं काटती पाप।।

माँ दुर्गा सुखदायिनी ,जग की पालनहार।
पूजो माँ को नौ दिवस, कर देगी उद्धार।।

देवी पूजा अर्चना, नमन करूँ धर ध्यान।
बिन माँगे मोती मिले, दुख का करे निदान।।

माँ का सुमिरन जो करे,भक्ति भाव गुणगान।
भवसागर से तारती, मैया दे वरदान।।

माता को नित पूजके,कर्म करे जो नेक।
जीवन में सुख भोगता,पाकर बुद्धि विवेक।।

डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
संपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी

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