माँ तू बहुत खास है

माँ तू बहुत खास है,
तू केवल एक औरत नहीं, बल्कि एक एहसास है।।
मैं तो कुछ भी नही तेरे बिना माँ, मेरी साँसे भी तो
असल में, तेरी ही साँस है, माँ तू बहुत खास है।।

घोर निराशा में भी तू एक आस है
मेरे हर लड़खड़ाते कदम को जो दे हरदम सहारा,
माँ तू वही निस्वार्थ प्रयास है, माँ तू बहुत खास है।।

शायद मेरे पिछले जन्मों के कर्मों का तू प्रतिफल है,
मेरे लिए तू ही काबा, काशी, तू ही हर तीर्थ स्थल है,
माँ तू है, तभी इस मरणशील देह में
अमर आत्मा का निवास है, माँ तू बहुत खास है।।

माँ तू है तो घर में रौनक है,
चूड़ी-पायल की छनछन और बर्तनों की खनक है,
तेरे बिना तो घर का एक-एक कोना सुना है माँ,
तू नहीं तो हर ईंट भी जैसे लाश है, माँ तू बहुत खास है।।

परिवार को बांधने वाली तू एक अटूट डोरी है,
तू ही सबकी नींद और सबकी लोरी है,
खुद बिखर कर भी जो बिखरने न देती किसी को,
माँ तू वही अटल विश्वास है, माँ तू बहुत खास है।।
– ✍️विवेकानंद विमल,
पाथरौल, मधुपुर, झारखण्ड

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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