माँ तुम्हारी उपस्थिति

माँ! तेरी अनुपस्थिति में
ना जाने मुझे क्या हो जाता है?
लाख कोशिश के बाद भी
रोटियाँ गोल नहीं बनती ।
गैस पर रखी दूध उबल कर
ना जाने कहाँ-कहाँ बह जाती है
सब्जियां जल कर राख हो जाती है ।

और तुम्हारे उपस्थिति के
अहसास मात्र से ही
पहली प्रयास में रोटी गोल तो क्या
गुब्बारे की तरह फुल कर
तवे से बाहर निकलती है ।
दूध उबल कर बहती नहीं
गैस पर पतीले में रखे-रखे
रबड़ी बन जाती है ।
सब्जियां जल कर राख नहीं होती,
सब्जियां खाने वाले मुझसे
जल कर राख हो जाते है ।

और तब समझ में आता है माँ,
तुम्हारी उपस्थिति हमारे लिए
क्या मायने रखती है ।
इसलिए विनती है माँ,
तुम अपने होने की उपस्थिति
हमारे मन के हर कोने में
हमेशा बनाए रखना ।

भावना कुमारी

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