माँ गूँजने दो मेरी भी किलकारी

माँ तेरी बगिया की
हूँ नाजुक सी कली
क्यों चढ़ाती हो
बार-बार मेरी ही बलि
बेटों को हमेशा तूने
मुझसे ज्यादा ही चाहा
पढ़ाया -लिखाया,
सर पर खूब चढ़ाया
मुझे दिलाती रही
बेटी होने का सदा ही भान
मैंने रखा फिर भी
हरदम ही सबका मान
संस्कारों में पली
फिर भी गई हरबार छली
मेरी मासूम हँसी सदैव
तूने कर दिया बेटों पे कुर्बान
मैं फिर भी न जली, सदा खुश रही
शिक्षा का दिया न अधिकार मुझे
फिर भी छुप -छुपा के आगे बढ़ती रही
तेरा नाम किया जग में उजागर
माँ फिर भी हुई मैं पराई
जल्दी से तूने कर दी मेरी विदाई
जब पढ़ -लिख बेटा गया विदेश
न चिट्ठी न भेजा कोई संदेश
तेरी पथराई आँखें
बाट रही निहार
सुन के तेरी करूण-पुकार
मैं दौड़ी आई माँ तेरे द्वार
माँ फिर भी मैं बोझ ही बनी
जननी होकर भी जननी को छली
उड़ने न दिया उनमुकत गगन में
छूने न दिया चाँद-तारों को
मैंने फिर भी रचा इतिहास
अपने कर्मों से भाग्य बदलती रही
जितना भी रोका कदम
पथ के रोड़ों से लड़ती गई
मैं खुद सँवरती गई
डगमगाने न दिया
अपने आत्मविश्वास को
नया सबेरा लाकर रही
हर युग में, हर जन्म में
कंधे से कंधा मिलाकर चली
मेरे बिना तो राम भी कहाँ था पूरा?
कभी बनकर लक्ष्मी बाई
अंग्रेजों के दाँत खट्टे किए
छूने न दिया आबरू को
जब न दिखा सकी ताकत अपनी
कर लिया जौहर व्रत
स्वाभिमान से जिया , स्वाभिमान से मरी
माँ मैं तो हूँ बस तेरी ही छवि
चमकने दो मुझे
ज्यों गगन में चमक रहा रवि
मैं कल भी थी,
आज भी हूँ
और कल भी रहूँगी
चाहे जितना भी चाहो
मिटाना मेरी पहचान
सृष्टि की अनमोल उपहार हूँ
होऊँगी न बेकार
माँ मुझपर कर दो इतना उपकार
कर लो मुझे तुम स्वीकार
दे दो मुझे भी मेरे हिस्से का प्यार
बना लो अपनी दुनिया को
बेटियों की खुशी से हसीन
क्यों होती है तू गमगीन?
मैं अबला नहीं हूँ सबला
दूर कर दूँगी तेरी परेशानियाँ सारी
महकाऊँगी घर -आँगन तेरी
बस माँ गूँजने दो मेरी भी किलकारी
हाँ माँ गूँजने दो मेरी भी किलकारी ।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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