“ माँ गंगा ”

गंगा कल-कल करती जाती अविचल ,
मन है जिसका चंचल, हृदय स्वच्छ निर्मल ,
बह जाते जिसमें सारे के सारे दावानल ,
फिर भी जल है जिसका रहता शुभ मंगल I

फुदक-फुदक कर सन्देश दे प्रतिछण ,
बढ़ते जाओ खुद को बनाओ विलछण ,
जीवन में तभी तुम बनोगे कर्मठ-सबल,
मुझसे दूषित भी मिलकर बन जाते गंगाजल I

“माँ गंगा” का एक सन्देश :

मेरे आँगन में सब है जैसे एक थाल समान ,
खुद को ऐसा संवारो कोई न कर सके सवाल ,
सबको बता दो, जग में तुम हो एक बेमिसाल ,
“इंसानियत” से बढ़कर नहीं कोई धर्म मेरे लाल I

तेरे घर-आँगन में खेलता “राज ” हर पल ,
तुम ही बढ़ाती जाती हमेशा इसका मनोबल,
मन में उमंग, संघर्ष शीलता तुम्हारा तपोबल ,
सदियों तक रहोगी तुम, शुभ-मंगल गंगा जल I

गंगा कल-कल करती जाती अविचल ,
एक रहने की सीख बताती जाती प्रतिपल I

देशराज “राज”कानपुर

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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