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माँ की महिमा

माँ की महिमा
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जिसकी बाहें सुख देती है, जैसे कोई पलना।
उंगली पकड़ जिसका हमने,सीखा पग-पग चलना।।
जिसके पैरों में जन्नत की, बात सभी करते हैं।
जिसके उर में सदा देवता, वास किया करते हैंं।।

इस देवी को माँ कहते है, सुनलो मेरे भाई।
अपनी माँ को बचपन से ही, कहते है हम माई।।
साया बन माँ साथ निभाती, दुख सारे हर लेती।
पीड़ा में खुद को रख कर भी, खुशियाँ हमको देती।।

माँ की ममता जैसे कोई, अमृत भरा हो गागर।
आँचल माँ की लगता हमको, शक्ति पुँज की चादर।।
माँ के जैसा देव न देवी, इस दुनिया में दूजा।
इस जग की जनयित्री का सब, करें सदा ही पूजा।।

माँ जैसा ना रिश्ता जग में, माँ ही जग में न्यारी।
माँ बिन कोई सीच सके ना, जीवन की यह क्यारी।।
देवों ने भी माँ के चरणों, को ही जन्नत माना।
जिसने भी की सेवा माँ की, रहा नहीं कुछ पाना।।

पालनकर्ता को धरती पर, माँ ने ही था पाला।
यशोदा ने ही श्री कृष्ण की,कायाकल्प कर डाला।।
वेद पुराणों ने माना है, माँ से बड़ा न कोई।
जिसपर कृपा माँ की बरसे,राम कृष्ण -सा होई।।
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पं.संजीव शुक्ल “सचिन”
मुसहरवा (मंशानगर)
पश्चिमी चम्पारण
बिहार

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