माँ की अलंकार महिमा

माँ लफ्ज़ जब भी बोला जाता है !
जननी तेरा ही चेहरा नजर आता है !
माँ एक अलंकार संपूर्ण समर्पण !
प्राकृतिक चरित्र तेरा ही नज़र आता है!

अस्तित्व तेरा विशाल आँचल ही पहचान !
आगोश तेरा आकाश सम फैला आसमान

रोम रोम पुलकित और फैल जाता है
हृदय की धड़कन मल्हार प्रेम के
राग ताल सुरो में संगीत बन जाता है !

तू ममता सादगी प्रेम त्याग सौहार्द की
साक्षात मूर्त सहज ही दर्शन हो जाते हैं !

होता होगा अपना-पराया
तू स्नेही गैर भी हो अपना
तुम श्रृद्धा सहयोग प्रतीति !

तू बीज धरा सम
तू धात्री तू पोषक संवर्धन
अहं कष्ट कलह नफरत रुप अंधकार सब हरती !

तेरी कृपा तेरे कृतार्थ !
तू है तो कुटुंब समाज !
तू रोधक तू शोधक तू बोधक !

.
डॉ_महेन्द्र
महादेव क्लिनिक ,मानेसर (हरियाणा)

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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