माँ का स्वरूप...

नफ़रतों की दुनियां में,इक माँ ही अपनी होती है,
हँसती है हमारे लिए,हमारे लिए ही यह रोती है।

सुकून से हम रहें, सुख चैन अपना वो खोती है,
दुःख में भी,चेहरे पर शिकन इसके नहीं होती है।

धन दौलत की चाहत, इसको कभी नहीं होती है,
बच्चों की बस इक मुस्कान पर,ये कुर्बान होती है।

गर मुश्किल में हों,बच्चे कभी परदेस में इसके,
तो दुआओं के रूप में पास उनके यह होती है।

देखा नहीं ईश्वर को,सूरत कैसी उसकी होती है?
धरती पर ईश्वर के रूप में,माँ ही शायद होती है।

कमलेश आहूजा’कमल’
मुम्बई(महाराष्ट्र)

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 44

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like 15 Comment 77
Views 209

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share