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माँ – एक दर्पण

_ *माँ – एक दर्पण*_

माँ है एक मूक समर्पण ,
जीवन का अद्भुत-सा दर्पण,
दिखता है, जिसमें बिंब अपना ,
ममतामय भावों का सुंदर सपना ।

उदास हूँ मैं तो बुझ जाती है माँ,
हँस पड़ूँ तो खिलखिलाती है माँ,
चल दूँ गर तो चल पड़ती है माँ,
ठहरे क़दमों संग ठहर जाती है माँ,

मेरी सपनीली नींदों संग सोती है माँ,
पलकें मैं खोलूँ तो जगती है माँ,
सँवरूँ यदि मैं तो सँवरती है माँ,
आस्था हूँ मैं तो विश्वास है माँ ।

सच कहूँ तो ऐसा समर्पण है माँ,
जीवन का अद्भुत दर्पण है माँ ।

*डॉ सुषमा मेहता*
रोहिणी , दिल्ली

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