Nov 15, 2018 · कविता

माँ,बस एक लकीर हूँ मैं

आपके आॅचल से उठती एक
अदृश्य सी सुगंध की मुरीद हूँ मैं।

सौम्य से चेहरे पर उठती हल्की सी
मुस्कान पर मुस्काती ख़ुशनसीब हूँ मैं ।

आँखों में बंद ,अश्कों के आईने में
झलकती तस्वीरों में से एक तस्वीर हूँ मै।

दुआ,पूजा,आशीष के हर एक गारे
ईंट से चुनी,आपकी एक प्राचीर हूँ मैं ।

सही गलत,अच्छे-बुरे का फ़र्क बतलाती
कड़ियों में गूँथी एक मज़बूत जंजीर हूँ मैं ।

आपकी शिक्षा की शिलाओं पर
घिसी ,चमकाई ,धारदार शमशीर हूँ मैं ।

नहीं देख सकती खुद को आपसे अलग ,
आप हैं जीवंत मूरत , छाया मात्र हूँ मैं ।

आपके अस्तित्व को उकेरने की तमीज़ नहीं मुझमें
आपके हाथों से खींची ,बस एक लकीर हूँ मैं ।

पल्लवी गोयल
थाने,महाराष्ट्र

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