महुआ

बसंत ऋतु का आगमन और महुआ का जिक्र ना हो तो सब कितना अधुरा-सा लगता है। महुआ वृक्ष की महिमा प्राचीन काल में भी रही है। वर्तमान में महुआ से सरकार को अरबों रुपए का राजस्व प्राप्त होता है।
महुआ बसंत ऋतु का अमृत फल है । मधु मास महुआ के फूलने और फलने का होता है, महुआ फूलने पर ऋतुराज बसंत के स्वागत में प्रकृति सज-संवर जाती है, वातावरण में फूलों की गमक छा जाती है, संध्या वेला में फूलों की सुगंध से वातावरण सुवासित हो उठता है, प्रकृति अपने अनुपम उपहारों के साथ ऋतुराज का स्वागत करती है। आम्र वृक्षों पर बौर आने लगते हैं, तथा महुआ के वृक्षों से पीले-पीले सुनहरे फूल झरने लगते हैं। महुआ के फूलों की खुशबू मतवाली होती है। सोंधी-सोंधी खुशबू मदमस्त कर जाती है। महुआ के फूलों का स्वाद मीठा होता है, फल कड़ुआ होते हैं पर पकने पर मीठे हो जाते हैं, इसके फूल में शहद के समान सुगंध आती है, रस पूर्ण भरा होता है।
महुआ के फूल सूखकर गिरते नहीं, हर श्रृंगार पुष्प की भाँति झरते भी नहीं, टपकते हैं । हो सकता है इनका शँकु आकार और रससिक्त होना बूँद टपकने का भ्रम उत्पन्न करने का कारक का काम करता हो, इसीलिए ये झरने की बजाय टपकते हैं । इनका जीवन काल अत्यल्प होता है । रात्रि की गुलाबी शीतल निस्तब्धता में यह फूल मंजरियों के गर्भ से प्रस्फुटित होता है और ब्राह्म मुहूर्त में भोर के तारे के उदय होने के साथ टपकना शुरु कर देता है । जितनी मन्जरियों में उस रात ये फूल पुष्ट हुए होते हैं, अपनी परिपक्वता के हिसाब से क्रमशः धीरे धीरे करके टपकने लगते हैं । यह क्रम ज्यादा देर का नहीं होता । सूर्योदय से लेकर यही कोई तीन चार घंटे में सारा खेल ख़त्म हो जाता है । महुआ का फूल बीस बाईस दिन तक लगातार टपकता है। महुआ के फूल में चीनी का प्रायः आधा अंश होता है, इसी से पशु, पक्षी और मनुष्य सब इसे चाव से खाते हैं ।
महुआ के फूल की बहार मार्च-अप्रैल में आती है और मई-जून में इसमें फल आते हैं। इसके पेड़ के पत्ते, छाल, फूल, बीज की गिरी सभी औषधीय रूप में उपयोग की जाती है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके फूलों को संग्रहीत करके लगभग अनिश्चित काल के लिए रखा जा सकता है। यह गरीबों का भोजन होता है। इसे आप गरीबों का किशमिश भी कह सकते हैं।
महुआ भारत के आदिवासी अंचल की जीवन रेखा हैं। आदिवासियों का मुख्य पेय एवं खाद्य माना जाता है। यह आदिवासी संस्कृति का मुख्य अंग भी है। इसके बिना आदिवासी संस्कृति की कल्पना ही नहीं की जा सकती। महुआ, आम आदमी का पुष्प और फल दोनों हैं। आज के अभिजात शहरी इसे आदिवासियों का अन्न कहते हैं। सच तो यह है कि गांव में बसने वाले उन लोगों के जिनके यहां महुआ के पेड़ है, बैसाख और जेठ के महीने में इसके फूल नाश्ता और भोजन हैं। आदिवासी परम्परा में जन्म से लेकर मरण तक महुआ का उपयोग किया जाता है। महुआ आदिवासी जनजातियों का कल्प वृक्ष है। ग्रामीण क्षेत्रों में महुआ जैसे बहुपयोगी वृक्षों की संख्या घटती जा रही है। 🌹 🌹 🌹 🌹 -लक्ष्मी सिंह 💓 ☺

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