महाप्रलय की गोद जगा दे !

महाप्रलय की गोद जगा दे !

उत्ताल तरंगाघात प्रलयघन
सागर की ललकारें ,
उठे पड़ी सुसुप्त समृद्ध
वीरों की हुंकारें !
विशुद्ध धवल प्रकटे पुण्य,
तेजपुंज रथ दिव्य उड़े ;
उठे स्नेही सुगंधी सुमनोहर ,
ताप संताप प्रलाप झड़े !
दया-दान, सत्कर्म-धर्म के,
पुण्य प्रबल प्रतापें ,
जगे सन्नध सप्तसिन्धु की
सप्त सुनहरी रातें !
सभ्यता का सार जगे,
जगे सम्पूर्ण दिवस-रातें ;
जगे विप्र तेज तिक्ष्ण,
विकराल अभिशाप और श्रापें !
जाग जाए धैर्य अप्रतिम,
महाप्रलय की हुंकारें ,
वज्र हृदयों में अंगार जगे ,
भुजदण्डों में शोभित तलवारें !
महावीरों का शौर्य जगे,
जगे विराट संस्कृति विस्तारें ;
समर भयंकर भारी जगे ,
भावी प्रलयंकारी टंकारें !
षड्यंत्रों से रणभूमि घिरी पड़ी है,
चतुर्दिक आहें पसारे ;
महाप्रलय की गोद जगा दे ,
पुनः भर दे शीतल संचारें !

✍🏻 आलोक पाण्डेय

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