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महक

Neelam Naveen

Neelam Naveen "Neel"

कविता

February 10, 2017

जिसने मुफलिसी न देखी हो
वो क्या सच में गीत भाव रचेंगे !
सोचो!रोटी कपडा मकान को लाँघ,
आगे गयी जिनकी भूख व चाह !
परंतु आज भी कई वेदनाओं में
सिसकती, कंही कतरन ढकी सांसें !
खुली अधखुली झोपड़ियों के छिद्रों से
ढ़िभरीयों की रोशनी व तारों में ही
रोटी, कपडा, मकान की तो छोड़ो
वो गुरबतों का संबल तलासते हैं
रोटी की बस एक महक तलासते हैं !

डायरी से
नीलम नवीन ‘नील’
4 जनवरी 2017

Author
Neelam Naveen
शिक्षा : पोस्ट ग्रेजूऐट अंग्रेजी साहित्य तथा सोसियल वर्क में । कृति: सांझा संकलन (काव्य रचनाएँ ),अखंड भारत पत्रिका (काव्य रचनाएँ एवं लेख ) तथा अन्य पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । स्थान : अल्मोडा
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