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मसलहत

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

कविता

January 2, 2017

मसलहत थी इक आशियां बनाने की
तुम बना बैठे महखाने को अपना घर ।
तल्ख़ कर बैठे जिन्दगी अपनी
ज़ाम-ए-ज़हर जो सीने में उतरा तुमने
परतोख़ बहुत थे तुम्हारे सामने
पर अंधा कर दिया इस ज़ाम ने
अब तो संभलो यह जिंदगी तुम्हारी है
बहुत जारीबाना चुकाया तुमने इस ज़ाम का
अब तो छोड़ने का बेख़ता अख़्तियार है तुमको
या अब भी प्यार मयस्सर है इससे
अगर है भी तो तब्दील करो यार इसमें
जवाबदेह होना है ख़ुदा के इजलास में
मसलहत है अब भी प्यार के असबाब की
मसलहत थी इक आशियां बनाने की
तुम बना बैठे महखाने को अपना घर ।।
?मधुप बैरागी

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Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल 13.7.2017 स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना... Read more
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