कविता · Reading time: 1 minute

मर रही जवानियां !

चीर संस्कृतियों का भव्य देश बंजर हो गया है ,
दग्ध ज्वालों में घिरे , घीस पत्थर हो गया है !
बेहूदे नग्न नर्तन होते नैतिकता के वक्ष पर ,
मूल्यों की हत्या हो रही , हर मानवीय दक्ष पर !
सिन्धु में बिन्दु समाहित , केन्द्र है जिहाद का,
विघटन पलायन दंश में सब दाह ही विषाद का !
केन्द्र में जिहाद है ,उत्पात ही मचायेगा ,
विचार शून्यता अकड़ खड़ी है,दाहकता फैलाएगा !
उथल-पुथल धरती है व्याकुल, जल जला डालेगा अब ,
बर्बरता का मिश्रण में संसाधन लूट डालेगा अब !
सब मूक दर्शक हो गए हैं , मर रही जवानियां ,
हिन्दूओं के अस्तित्व पर लटक रही बलिदानीयां !
सब बेसुध सुसुप्ति में , लूटे जा रहे खड़े मौन ;
बेटियों के अस्तित्व की रक्षा कर पायेगा कौन ?
घर जल रहें हैं आज , सिसक रहीं फुलवारियां ,
उन्मादों के साये में डूब रही सिसकारियां !
मृत शासन कड़ा खड़ा ले दण्ड के बौछार को,
हिन्दूओं के करने मान भंग ,घोर अत्याचार को !
लग रहा है बढ़ता जिहाद यह शीघ्र अंग पायेगा ,
कैसे भारत भव्यता को भंग कर पायेगा !

यदि नहीं दृढ़ हो , सशक्त बन , दस्यु को भगाएंगे ,
सोचिए बारम्बार पुनः मुस्कुरा क्या पायेंगे !

आलोक पाण्डेय

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