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मराठी दाल

रात्रि के भोजन में पंत जी घर में खाने की मेज़ पर मराठी दाल देख को देख कर उनको भीतर ही भीतर खाने से अरुचि हो गयी क्योंकि वह आमियाँ और गुड़ डालने से खट्टी एवं मीठी हो गई थी उसमें मिर्ची भी तेज थी इन कारणों से पंत जी को वह दाल अच्छी नहीं लगी , बस इस बात को भोजन की मेज पर सार्वजनिक रूप से प्रगट करने की हिम्मत नहीं जुटा पाने के कारण अंदर ही अंदर वे क्रोघ का घूंट पी रहे थे । उन्हीं के सामने उस दाल को घर के अन्य सभी सदस्य बड़े चाव से खा रहे थे , ऐसे में उस दाल की बुराई करने पर वे घर के अन्य सदस्यों के बहुमत का शिकार हो सकते थे । क्योंकि इस कोरोना काल में यह दाल बिना किसी सहायक के उनकी पत्नी ने स्वयं बनाई थी जिनके विरोध करने की सामर्थ एवम साहस उनके अंदर नहीं था और ऐसा करने पर भविष्य में मिलने वाले व्यंजनों पर भी इस बात का असर पड़ सकता था अतः इन बातों पर विचार करते हुए वे मन ही मन घुमड़ते क्रोध को पीते हुए उन्होंने आधा अधूरा सा खाना खाया और कुर्सी को झटके से सरकाते हुए उठ खड़े हुए । उनका मन नहीं लग रहा था जब कि घर के अन्य सभी लोग सामान्य थे । क्रोध में वे अकेले जाकर किसी दूसरे कमरे में सोफे पर बैठ गए । उनके शयनकक्ष में कुछ देर बाद रोज की तरह उनका मनपसंद किसी वेब सीरीज का टीवी सीरियल आरम्भ हो चुका था । पर वे उसका आनन्द नहीं ले पा रहे थे ।
वे अंदर ही अंदर क्रोधित थे और उन्होंने इस बात का जिक्र घर में किसी से नहीं किया था , कुछ देर बाद अपने क्रोध को समेटकर वे अपने शयन कक्ष में जाकर बैठ गए और उस टीवी पर चल रही वेब सीरीज में काफी समय से चली आ रही हल्दी की रस्म में मन लगाने का असफल प्रयास करने लगे । इस तरह काफी समय व्यतीत हो जाने के बाद उन्होंने एक पुस्तक उठाकर पढ़नी चाही पर उसमें भी मन नहीं लगा और कुछ समय इसी ऊहापोह में बिताने के पश्चात निद्रा में लीन हो गए । अगले दिन वे सुबह की चाय के समय उन्हें कल रात की दाल वाली बात फिर से याद आ गई और मन में पुनः क्रोध का स्तर बढ़ गया वे रोज़ की तरह चाय पीते पीते समाचार देखते थे ,आज उन्होंने खिसियाहट में टीवी भी नहीं खोला । चाय समाप्त होने के बाद गुस्से से कप को पार्श्व में रक्खी मेज़ पर पटक कर रखते हुए पुनः लेट गए और लेटे रहे । पत्नी ने शांत चित्त और सहज भाव में रहते हुए उनके साथ सुबह की चाय का आनंद लिया और कुछ दिन की योजनाओं पर सामान्य बातें करते हुए घर के अन्य कामों में व्यस्त हो गई ।लेटे लेटे पंत जी जब ऊभने लगे तो सुबह उठकर घर में इधर-उधर क्रोध में भरे हुए निरूद्देश्य अकेले – अकेले , अकड़ – अकड़ कर एक कमरे से दूसरे कमरे में विचरण करने लगे । घर में सभी कुछ सामान्य चल रहा था पर वे हर किसी कार्य को करने में अपने को असहज महसूस कर रहे थे तथा उनके चेहरे की मांसपेशियां तनी हुई थीं और वे क्रोध में भरे अकड़े – अकड़े इधर से उधर अपने पांव पटकते घूम रहे थे ।
अब उन्हें क्रोध उस मराठी दाल दाल पर से हट कर इस बात पर आ रहा था कि घर का कोई भी सदस्य उनके क्रोध को संज्ञान में क्यों नहीं ले रहा था । अब उनका गुस्सा दाल से हट कर इस वज़ह से और भड़क रहा था कि उनकी क्रोधाग्नि से उनकी पत्नी अछूती एवम सहज क्यूँ थी ।
उनके इतने असहज एवं क्रोध में भरे व्यवहार से प्रगटे हाव-भाव को किसी ने भाव क्यों नहीं दिया ? घर के किसी सदस्य ने भी उनसे यह नहीं पूछा कि क्या तुम गुस्सा हो ? घर के कुत्ते भी सुबह की भाग दौड़ करने के बाद कोनों में बैठे ऊँघ रहे थे । पंत जी ने गुस्से में भरे भरे अपनी कुछ प्रातःकालीन दैनिक क्रियाओं को सम्पन्न किया और फिर थोड़ा सा नाश्ता कर भिन्नाते हुए अपने कोरोना काल को काटने में लग गए जो अकेलेपन में अब और बोझिल हो चला था ।
दोपहर को भोजन की मेज़ पर जब पन्त जी से जब नहीं रहा गया तो उन्होंने सबको इस रहस्य पर से पर्दा उठाते सब से पूछा
‘ क्या किसी को पता है कि वे कल शाम से गुस्सा हैं ? ‘
इस पर घर के लोगों ने सामान्य भाव से उनसे पूछ लिया
‘ क्या बात है ? क्यों गुस्सा हो ?
तब उन्होंने मराठी दाल वाली बात सबको विस्तार से बताना चाही । उनकी यह बात सुनकर घर के कुछ सदस्यों को हंसी आ गई और कुछ ने उनके क्रोध का विवरण जानने में कोई रुचि नहीं ली न ही ध्यान दिया ।
वे सोच रहे थे कि कल शाम से वे क्रोध में भिन्नाते फिर रहे थे और इसे ज़ाहिर करने के बाद भी किसी पर उनके गुस्से का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और ना ही किसी ने उनको मनाने का कोई प्रयास किया , भला ऐसे क्रोध का क्या फ़ायदा जिसमें खुद का ही नुकसान हो और अगले को निष्प्रभावी देख ये और भड़के । क्रोध एक द्विपक्षीय भाववाचक संज्ञा है जिसमें द्वितीय पक्ष की प्रतिक्रया न मिलने पर यह व्यर्थ हो जाता है ।
अंत में पंत जी को यह समझ में आ गया था कि जिस प्रकार प्यार में अपने व्यवहार से उसका इजहार करना ही काफी नहीं होता वरन उसे ‘ आई लव यू ” जैसे शब्दों के माध्यम से उच्चारित कर प्रगट करना आवश्यक होता है , उसी प्रकार यदि कभी उन्हें क्रोध आए तो उसे उस समय
‘ आई एम एंग्री ‘ या मुझे क्रोध आ रहा है या हम गुस्सा हैं ‘
जैसे शब्द मुख से उच्चारित कर उसका कारण स्पष्ट कर निराकरण कर लेना चाहिए ।
उस दिन इन्हीं ख्यालों में उलझे – उलझे अपने दिल को समझाने के लिए किसी पुराने सूत्र की बतर्ज़ उन्हों ने निम्न सूत्र की रचना की
‘ हुस्न बेकार जाता है यदि कोई चाहने वाला न हो ।
क्रोध बेकार जाता है यदि कोई मनाने वाला न हो ।।’

Disclaimer
यहां समझाने के लिये मराठी दाल के नाम को क्रोध के जनक हेतु उदाहरण के स्वरूप उपयोग में लिया गया है , पाठकगण अपनी पसंद के अनुसार इसके इतर अपनी कोई अन्य व्यक्तिगत घरेलू क्रोध जनक परिस्थिति जोड़ कर पढें ।

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