ममता भरे बीते लम्हें

माँ की याद में कुछ भाव उमड़ आए
जिन्होंने बीते लम्हें कुछ इस कदर याद दिलाए ||

*माँ ! आज तुम्हारी बहुत याद आई
इस तन्हाई ने यह कैसी पुकार लगाई
माँ आज तुम्हारी बहुत याद आई
वो बातें वो लम्हें, वो तेरी ममता का आँचल
सोच कर भर आई अखियाँई, भर आई अखियाँई

मैं रूठती थी तो मनाती थी तुम
भूख लगती थी तो खिलाती थी तुम
दर्द होता था तो दवा भी लगाती थी तुम
उदास होती थी तो मुख पर खुशी ले आती थी तुम
कैसे भूलूँ उन लम्हों को जो तुम्हारे साथ बिताए थे खुशी के
आज भी वह ताजा हैं आँख नम होती चली आई

नहीं पता था अपने समय में क्या होता है यह मातृदिवस
आज सभी को गले लगे देख भर आई है मेरे नयन
होती गर तुम मेरे पास तो मैं भी तुमसे करती वो सभी बातें
कुछ कहती अपने दिल की कुछ सुनती तुम्हारी बातें
गले लगाकर तुम्हें देती बधाई मातृदिवस है आज
तुम रहो हमेशा यूँ ही मेरे साथ

मगर यह पल शायद ना था मेरी झोली में
बीत गए यूँ ही कई बरस तुम्हारे बिन दिवाली होली में
न आई तुम, न तुम्हारी आहट ही सुन पाई
आँख खुली तो पाया तन्हाई के साथ यादों में ही तुम नज़र आई
व्यवस्तता में दिन रोज गुजर जाता है
मगर जब आती है तन्हाई में तुम्हारी याद
तो दिल पर ,ज़ुबा पर सिर्फ तुम्हारा ही जिक्र आता है

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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