कविता · Reading time: 1 minute

मन

मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष
का कारक है,
बांधता सांसारिक बंधनो में और
विकारों का नाशक है।
मन की कुंजी दिया हमें ईश्वर ने
खोलने नर्क-स्वर्ग का द्वार,
खुद ही तय करना होगा जाना
तुमको किस पार।

मन से हारा-हार गए मन
से जीता-जीत गए,
जिसने रखा दृढ़ मन को वही
जग में महान हुए।
दुःख-सुख में जिसनें छोड़ा
अपना पौरूष,
मरता है मनुष्य मन में संताप
लिए।

जय-पराजय, लाभ-हानि, अपयश-
यश, दुःख-सुख मन के कारक,
रंगेगा मनुष्य उसी रंग में करेगा जैसा
अनुभव।
दृढ़ मनोबल से मिलती है मन को
आंतरिक शक्ति,
मन से जीते इंसान को नही खानी
पड़ती मुँह की।

मन को वश में कर महाराणा बने
महान,
मन मे दृढ़ संकल्प रख कर अकबर
का चूर किया अभिमान।
जो मन से हारा स्वीकार किया
अधीनता को,
मन से जितने वाले रौंदते है
हिमाच्छादित पर्वतों को।

मन को सदैव बनाये रखें शक्ति संपन्न,
पराजय नही हो सकता जीवनपर्यंत।
हीन भावना से कभी दुर्बल न बनाना
मन को,
जीत कर अपने मन को जीत लो
सम्पूर्ण जगत को।

(स्व रचित) आलोक पांडेय गरोठ वाले

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