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मन

Kokila Agarwal

Kokila Agarwal

कविता

January 9, 2017

मन

आंख खोल जब वो मुस्काया
प्रथम परिचय बंदिश का पाया
जैसे जैसे सम्भला जीवन
खुद को तन पिंजरे में पाया

देखा चारो ओर ही बंदिश
समय चक्र बलशाली था
भोर की पहली किरन से लेकर
रजनी को बंदिश ने पाला था

कुछ उखड़ी सांसों को देखा
पल न लगा समझने में
मौत है इसकी सीमा रेखा
जीवन है इसकी बंदिश में

पर एक अजूबा तन में रहता
उत्श्रंखल सा मन है वो
उड़ता तोड़के बंदिश सबकी
अफ़सोस कि तन से ही है वो

जीवन जब तक है झांकेगा
लांघके खिड़की की सीमायें
पल दो पल स्वछंद उड़ेगा
अनुबंधो की तोड़ शाखायें

प्यार का पर्याय मन है पर
तिमिर भी कोने में जीता
पी लेता कड़वे घूंटो को
उनको अश्रू से धो लेता।

Author
Kokila Agarwal
House wife, M. A , B. Ed., Fond of Reading & Writing
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