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मन

Shubha Mehta

Shubha Mehta

कविता

September 7, 2016

उड़ चल रे मन
कर ले अपने सपनों को पूरा
देखे थे जो तूने कभी
मत देख आसमाँ को
बन्द कमरे की खिड़की से
चल,बाहर निकल
और देख खुले आसमाँ को
जिसका कोई ओर न छोर ।
तोड़ दे उन सीमाओं की जंजीरों को
जकड़ा है जिन्होंने सदियों से तुझे
चल निकल , कर ले कम से कम
एक स्वप्न तो पूरा
कर ले हौसला बुलंद
तभी तो सार्थक होगा
ये जीवन तेरा ।

Author
Shubha Mehta
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