कविता · Reading time: 1 minute

मन माया में दौड़ रहा

मन माया में दौड़ रहा
आंखें मूंदे भाग रहा
खोता रहा परम धन अपना
सुख शांति से नहीं रहा
पड़ा हुआ है धन के पीछे
ख्याल भी अपना नहीं रहा
सब कुछ पाकर भी जीवन में
असंतोष ही बना रहा
पड़ा हुआ है भौतिकता में
पागल हो कर भाग रहा
मिली एक नारी सुकुमारी
काम पूर्ण न हो पाया
जीवन भर अतृप्त रहा
चंचल मन न भर पाया
चैन नहीं आया लिप्सा को
अंतहीन सिलसिला रहा
मन माया में लगा रहा
बीत गया लिप्सा में जीवन
आंख खुली न समय रहा

सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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