मन - पंछी

दिन सूना
भीगी रात
बयार निगोड़ी
करे आघात
मन का पंछी
पंचम कैसे गाए
सिले अधर
पथराई बात
देखो न
फिर होने लगी
बिन जलधर
कैसी बरसात
तृण भीगे
भीगे पात
कैसी निष्ठुर
मीठी रात

अशोक सोनी
भिलाई ।

2 Likes · 2 Comments · 10 Views
पढ़ने-लिखने में रुचि है स्तरीय पढ़ना और लिखना अच्छा लगता है साहित्य सृजन हमारे अंतर्मन...
You may also like: