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मन की लगाम।

प्रेम कश्यप

प्रेम कश्यप

कविता

February 17, 2017

चल इधर आ
बैठ सुन उधर मत देख
यहाँ मुझ से बात कर
कभी दुसरों की बात नही सुनते
कभी दुसरों को बुरा नही कहते
वो देख हरे भरे खेत बाग बगीचे
हे भगवान!छोड़ ये झगड़ा
अब मान जा
ये तेरा मेरा छोड़
सब माया है
क्या खाऊं क्या न खाऊ
ऐसी इच्छामत कर
ऊंची उड़ान ये अच्छा है
कम थकान ये अच्छा है
सत्य को जान ये अच्छा है
मन की लगाम
पकड़ना नही है आसान।

रचनाकार :– प्रेम कश्यप

Author
प्रेम कश्यप
Prem Singh Kashyap Rajgarh, Sirmour HP D.O.B. 03/12/1970 MA{History/English} मैं शिक्षा विभाग मे 1995 से अध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ। कविता पढ़ना औऱ लिखना मुझे शुरू से ही अच्छा लगता था।लेकिन कभी कोई मौका नही मिला अब मुझे ये... Read more
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