कविता · Reading time: 1 minute

मन की बात कर रहे हैं

*मन की बात कर रहे हैं*
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*** 22 21 21 22 ***
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मन की बात कर रहे हैं,
जन हर रोज मर रहे हैं।

रग रग पर निशान भारी,
पल पल जख्म भर रहे हैं।

जन को राज ये न भाया,
सब क्यों आज डर रहे हैं।

सह कर झूठ का पुलिंदा,
गहरी पीर जर रहे हैं।

दिल पर जीत हो न पाई,
जल में हार तर रहे हैं।

मनसीरत कभी न बोला,
खुद से जान हर रहे हैं।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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