कविता · Reading time: 1 minute

मन की अभिलाषा

हिन्‍दी बने विश्‍व की भाषा।
स्‍वाभिमान की है परिभाषा।
गंगा जमनी जहाँँ सभ्‍यता,
पल कर बड़ी हुई है भाषा।
संस्‍कृति जहाँँ वसुधैवकुटुम्‍बकम्,
हिन्‍दी संस्‍कृत कुल की भाषा।
बाहर के देशों में रहते,
हर हिन्‍दुस्‍तानी की भाषा।
हर प्रदेश हर भाषा भाषी,
हिन्‍दी हो उन सब की भाषा।
आज राजभाषा है अपनी,
कल हो राष्‍ट्रकुलों की भाषा।
बने राष्‍ट्रभाषा यह ‘आकुल’
बस यह है मन की अभिलाषा।

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Author
1970 से साहित्‍य सेवा में संलग्‍न। अब तक 14 संकलन, 6 कृतियाँँ (नाटक, काव्‍य, लघुकथा, गीत संग्रह, नवगीत संग्रह ), 6 सम्पादित पुस्तकें। 1993 से अबतक 6000 से अधिक हिन्‍दी…
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