Sep 5, 2016 · कविता
Reading time: 1 minute

मन की अभिलाषा

हिन्‍दी बने विश्‍व की भाषा।
स्‍वाभिमान की है परिभाषा।
गंगा जमनी जहाँँ सभ्‍यता,
पल कर बड़ी हुई है भाषा।
संस्‍कृति जहाँँ वसुधैवकुटुम्‍बकम्,
हिन्‍दी संस्‍कृत कुल की भाषा।
बाहर के देशों में रहते,
हर हिन्‍दुस्‍तानी की भाषा।
हर प्रदेश हर भाषा भाषी,
हिन्‍दी हो उन सब की भाषा।
आज राजभाषा है अपनी,
कल हो राष्‍ट्रकुलों की भाषा।
बने राष्‍ट्रभाषा यह ‘आकुल’
बस यह है मन की अभिलाषा।

1 Like · 2 Comments · 437 Views
Copy link to share
Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul'
76 Posts · 4.8k Views
Follow 2 Followers
1970 से साहित्‍य सेवा में संलग्‍न। अब तक 14 संकलन, 6 कृतियाँँ (नाटक, काव्‍य, लघुकथा,... View full profile
You may also like: