कविता · Reading time: 1 minute

मन का रावण…!!

युग पर युग हैं बीत रहे
पर पापाचार मिटा ही नहीं,
असंख्य पुतले जले रावण के
रावण मन का मरा नहीं।
उत्सव कैसा यह विजय का है
औचित्य ना जिसका है कोई,
हर ओर पाप का ताण्डव है
अब तक ना राम बना कोई।
तब एक ही रावण था जग में
अब घर -घर में वह बैठा है,
कहने को उसका बध हुआ
पर हर मन में वह पैठा है।
जब तक मन का रावण न जले
पुतले को जलाए क्या होगा,
करे नित्य अधर्म यह मानव तन
फिर राम राम किए क्या होगा।
आओ अबकी संकल्प करें
मन के रावण को मारेंगे,
पाप मुक्त कर वसुधा को
हम जन – जन को अब तारेंगे।
………
©®पं.संजीव शुक्ल “सचिन”

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…
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