कविता · Reading time: 1 minute

मन का करघा

मन का करघा चला सूत से
एक चदरिया बुन डाली
रेशे रेशे में रंग केसरिया से
मन सन्यासी कर डाला

अन्तर्मन में तुझे सजाकर
नैनों की ज्योति से कर आरत
श्वासों के दीपों से वंदन कर
मन अर्पित कर डाला

कान्हा कान्हा बोल मैं डोला
वंशी की मीठी धुन ले सोया
ह्रदय में राधा मीरा धारण कर
मन ही वृंदावन कर डाला

मीनाक्षी भटनागर
नई दिल्ली
स्वरचित

36 Views
Like
36 Posts · 1.4k Views
You may also like:
Loading...