कविता · Reading time: 2 minutes

मन कहे मेरा

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माँ तेरे इस घर में ही तो बुना मेरे जीवन का ताना – बाना है
सुन मेरी प्यारी माँ मुझको दूसरे घर नहीं जाना है।
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माँ मुझको दूसरे घर नहीं जाना है।
मां मैं तो थी तेरे दिल का टुकड़ा।
कह देती थी तुझसे मन का हर दुखड़ा।
आज तू क्यों छिपा रही मुझसे मुखड़ा।
मां तुझको अपना दुखड़ा सुनाना है।
रोक लो न मुझे
मां मुझको दूसरे घर नहीं जाना है
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पापा आप का तो मुझ पर बरसता था प्यार।
आप कहते थे मुझे घर का श्रृंगार।
छाया रहा करता था मुझ पर आपका दुलार।
आप का यही लाड दुलार मुझे हरदम पाना है।
रोक लो न मुझे
पापा मुझको दूसरे घर नहीं जाना है।
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भैया तुमको तो मैं थी सबसे प्यारी।
हर पल मुझे ढूंढती थी अँखियाँ तुम्हारी।
बांटा करते थे तुम मुझसे सुख दुख की बातें सारी।
भैया मत भेजो मुझे, वहां मेरे लिए सब अनजाना है।
रोक लो न मुझे भैया
मुझको दूसरे घर नहीं जाना है।
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नन्ही बहना प्यारी बहना।
तू तो सुन ले मेरा कहना।
तुझे क्या मुझसे अलग है रहना।
अब तुझे ही मेरा साथ निभाना है।
रोक ले न मुझे।
बहना मुझको दूसरे घर नहीं जाना है।

नयन नीर भर बाबुल बोले
आ मेरी बांहों में जी भर रो ले
तू वह चिराग है जिसके प्रकाश में
एक नहीं दो दुनिया नहाईं हैं
हम नहीं मानते कि बेटी तू आज से पराई है।
एक नहीं दो-दो परिवारों की सभ्यता को तुझे बचाना है
और इसी पुण्य कर्म के लिए ओ लाड़ो तुझे दूसरे घर जाना है।

– रंजना माथुर दिनांक 23/07 /17 को
(मेरी स्व रचित व मौलिक रचना ) @copyright

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