Reading time: 1 minute

मन उस आँगन ले जाए (गीतिका)

आकर साजन तू ही ले जा क्यूँ ये सावन ले जाए
अधरों पर छायी मस्ती ये क्यूँ अपनापन ले जाए

भिगो रहा है बरस-बरस कर मेघ नशीला ये काला
कहीं न ये यौवन की खुश्बू मन का चन्दन ले जाए

कड़क-गरज डरपाती बिजली पल-पल नभ में दौड़ रही
कहीं न ये चितवन के सपने संचित कुंदन ले जाए

बिंदी की ये जगमग-जगमग खनखन मेरी चूड़ी की,
बूँदों की ये रिमझिम टपटप छनछन-छनछन ले जाए

पुहुप बढाते दिल की धड़कन शाखें नम कर डोल रहीं
कहीं न ये अँगड़ाई का फन बरबस कानन ले जाए

बढ़ी जा रही भीग-भीगकर चिकुर जाल की ये उलझन
कुन्तल से हरियाला तरुवर हर्षित उपवन ले जाए

रुनझुन-रुनझुन करती पायल बिछुओं से कह आयी है
सारे बंधन तोड़ सखी अब मन उस आँगन ले जाए.

~ अशोक कुमार रक्ताले.

1 Like · 4 Comments · 10 Views
Ashok Kumar Raktale
Ashok Kumar Raktale
16 Posts · 826 Views
You may also like: