मन उजला सा दर्पण हो।

काम क्रोध का ढेर नहीं हो मन उजला सा दर्पण हो।
उर में सत्य अहिंसा के सँग सेवा भाव समर्पण हो।
मिला यहीं पर सब कुछ तुझको यहीं रखा रह जायेगा।
मानवता के नाते सब कुछ मानवता को अर्पण हो।

प्रदीप कुमार “प्रदीप”

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पुलिंदा झूठ का केवल नहीं लिखता मैं गजलों में। rnहजारों रंग ख्वाहिश के नहीं भरता...
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