गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

मन्ज़रों के नाम होकर रह गयी

मन्ज़रों के नाम होकर रह गयी
खास सुरत आम होकर रह गयी

रात दुख की काटकर बैठै ही थे
जिन्दगी की शाम होकर रह गयी

ज़िंदगी का नाम क्या रखता कोई
मौत का पैग़ाम होकर रह गयी

रफ्ता रफ्ता पी लिए और जी लिए
ज़िंदगी क्या जाम होकर रह गयी

शायरी इन’आम की हक़दार थी
अब तो बस इल्ज़ाम होकर रह गयी

– नासिर राव

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