मनुज से कुत्ते कुछ अच्छे

मनुज से कुत्ते कुछ अच्छे
जनसंख्या विस्फोट कर रहे बन कर के टुच्चे |

दिव्य चेत बिन नाच रहा नर, बनकर नंगा
बिना ज्ञान के बढ़े गरीबी ,बढ़ते दंगा
सँभल बुढापे, पलटवार करते हैं अब बच्चे
मनुज से कुत्ते कुछ अच्छे

दारू पीकर शेषनाग बनती तरुणाई
गिर, नाली का पानी पी लेती जम्हाई
खास-खाँस लें श्वास रूप पर नाच रहे लुच्चे
मनुज से कुत्ते कुछ अच्छे

बेटी शिक्षा की भूखी, निज घर में रोती
पाषाड़ों-सी बनी, कुपोषित, दुख को ढोती
हे ईश्वर हम शांतआज भी बन करके कच्चे
मनुज से कुत्ते कुछ अच्छे
…………………………………….

बृजेश कुमार नायक
जागा हिंदुस्तान चाहिए एवं क्रौंच सुऋषि आलोक कृतियों के प्रणेता

“जागा हिंदुस्तान चाहिए” कृति की परिष्कृत रचना
पेज-65 से
पाठक बंधुओ से अनुरोध है कि वह उक्त रचना के अनुसार “जागा हिंदुस्तान चाहिए” कृति की “मनुज से कुत्ते कुछ अच्छे”रचना को परिष्कृत कर लें |
बृजेश कुमार नायक (pt Brijesh Nayak)
07-05-2017

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