मनहरण घनाक्षरी

निग़ाह राह टारता ,
रहा वक़्त गुजारता ।
हँस सँग दुनियाँ के ,
दर्द मैं बिसारता ।

जी कर खुशियों को भी ,
खुशी रहा निहारता ।
मैं एक दर्द के वास्ते ,
खुशी को दुलारता ।

बदलेगा आज कल ,
कल को क्यों पुकारता ।
बीत कर ही आज से ,
कल को बिसारता ।

होगा आज कल फिर ,
आज क्यों कल टालता ।
रुका नही वक़्त कभी ,
बात क्यों बिसारता ।
…. विवेक दुबे”निश्चल”@…

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