कविता · Reading time: 1 minute

मनहरण घनाक्षरी

पिचकारी धरी हाथ ग्वाले भी है संग साथ राधा की वो पूछे बात द्वार कोई आया है।
राधा करे अन-मन चलो चले मधुबन खेलेंगे न हम होली श्याम ने सताया है।
फिरो न यूँ मारी-मारी वहां भी तो हैं बिहारी पत्ते-पत्ते कण-कण उसकी ही माया है।
राधा खड़ी कर जोरी करना न बरजोरी नेह रंग डाल श्याम गरवा लगाया है।

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