Dec 23, 2016 · कविता
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मनहरण घनाक्षरी

नववर्ष

मनहरण घनाक्षरी -नववर्ष
०००
रोज-रोज नया वर्ष,
रोज ही मनाएँ हर्ष,
पा जाएं हम उत्कर्ष,
उच्च ए आदर्श है।
जिन्दगी का हो विकास,
दिल धरती आकाश ,
खुश रहे आस – पास,
सत्य परामर्श है।
नया बने कीर्तिमान ,
कीर्ति छुए आसमान ।
नहीं करो अभिमान,
सही ए निष्कर्ष है।
@डा०रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
अधिवक्ता /साहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

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DrRaghunath Mishr
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डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' अधिवक्ता/साहित्यकार/ग़ज़लकार/व्यक्तित्व विकास परामर्शी /समाज शाश्त्री /नाट्यकर्मी प्रकाशन : दो ग़ज़ल संग्रह :1.'सोच... View full profile
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