मधु मास प्रेम रस घोल रहा

मधुमास प्रेम रस घोल रहा
मन पिया मिलन को डोल रहा
फागुन पर यौवन छाया
रंग सतरंगी मार रहा
प्रेम अग्नि की पिचकारी से
अंतस जमकर भिगो रहा
मन मयूर नाचे गाए
तन मन भाव विभोर हुआ
पोर पोर खिल उठा धरा पर
रोम-रोम रोमांच हुआ
सुध बुध सब बिसराई फागुन
लोक लाज ना भेद रहा

सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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