'मधुवन जैसा तेरा यौवन'

सुनकर कंगन नूपुर की धुन,
मदहोश न अब मैं हो जाऊँ।

तुम गीतों की आशा मेरी,
जीवन की अभिलाषा मेरी।
तुम खिलती धूप सुबह की हो,
मैं प्रियदर्शन मैं खो जाऊँ ।।

सुनकर कंगन नूपुर की धुन,
मदहोश न अब मैं हो जाऊँ।

कस्तूरी सा सुंदर यह तन ,
मधुवन जैसा तेरा यौवन।
मदमस्त रसिक मधुकर बनकर,
बॉंहों में तेरी सो जाऊँ।।

सुनकर कंगन नूपुर की धुन,
मदहोश न अब मैं हो जाऊँ।

आहट तेरी जब भी आए,
खुश्बू मदमस्त महक जाए।
तुम पुष्पमास की शेफाली,
लतिका का हार पिरो जाऊँ।।

सुनकर कंगन नूपुर की धुन,
मदहोश न अब मैं हो जाऊँ।

तुम लज्जालु अतिकोमल सी,
लगती हो स्वेत कमलदल सी।
किंचित तुम और ठहर जाओ,
अधरों का रस पी तो जाऊँ।।

सुनकर कंगन नूपुर की धुन,
मदहोश न अब मैं हो जाऊँ।

स्वरचित
-जगदीश शर्मा ‘सहज’
अशोकनगर, मध्यप्रदेश
मोबाइल न. 9826436802

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