मदरसा

फागुन महीने का तीसरा शुक्रवार | आज ही होलिका दहन होगा और कल रंग खेला जायेगा | पूरे गाँव में उल्लास और उत्साह का माहौल है | हर घर से गुझिया और नमकीन बनने की महक आ रही है | कहते हैं न, त्यौहार बच्चों कि आँखों में पलते हैं और उनके दैनिक व्यवहार में पनाह पाते हैं | समूचा गाँव बच्चा हो गया है और बच्चे पिचकारी | पूरे गाँव के रिश्ते फागुनी हो गए हैं, सभी मरद देवर हैं और सभी औरतें भौजाई | होली भाईचारे का त्यौहार है जहाँ धरम, जाति-बिरादरी, उंच-नीच, छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब सब पर बेलन चल जाता है और सभी एक समान हो जाते हैं | एक रंग में रंगा इंसान, दलित है या सामान्य, हिन्दू है या मुसलमान कोई नहीं पहचान सकता | गाँव की इसी रवायत को निभाते हुए इस साल भी पांच मन लकड़ी होलिका दहन के लिए मस्जिद की ओर से और पांच मन मंदिर की ओर से आ गई है | गाँव में बने नए नए मदरसे में हिन्दुओं ने जिस तरह से तन, मन, धन से मदद की उसकी मिसाल आस पड़ोस में दी जा रही है | घसवारी गाँव की गंगा-जमुनी तहजीब में ईद, मुहर्रम, दिवाली, दशहरा, होली सब गड्ड-मड्ड हैं |
जुमे कि नमाज़ अदा करके लौटते कल्लन, रईस, जावेद, इद्दू, शहजादे के चेहरे चमक रहे हैं, इन छोटे बच्चों का यह चौथा जुमा है | सफ़ेद कुरता पायजामा और गोल टोपी में दमकते इन बच्चों के साथ गाँव के रतन, किशुन, प्रकाश, कल्लू, नन्दू और जोरावर कबड्डी खेलने को आकुल हैं | ये गाँव की छोटी पार्टी की सबसे तगड़ी कबड्डी की टीम है | लेकिन ये सारे पूरी तरह से आज होली खेलने के मूड में हैं | और ये क्या किशुन ने इद्दू के कुरते पर रंग डाल दिया | होली है भाई होली है….

किशुन ! पगला गए हो का ? इद्दू का गेहुआं रंग लाल हो आया |

नहीं भाई होलिया गए हैं, नंदू ने चुटकी ली |

तुम तो चुप ही रहो नंदू, जावेद ने कालर पकड़ ली |

जानते नहीं तुम होली खेलना हमारे यहाँ हराम है | कल्लन हांफ रहा था |
रतन ने बीच बचाव किया तो उसे जोर का धक्का लगा |

मदरसे वाले मौलवी साहेब कहते हैं काफिरों के साथ रंग खेलने से आदमी दोज़ख में जाता है | शहजादे ने किशुन को थप्पड़ रसीदा |
वो देखो हाजी चच्चा आ रहे हैं, प्रकाश चिल्लाया तो सब रुक गए |

चच्चा…. चच्चा…., किशुन ने इद्दू को रंग लगा दिया तो वह लड़ने लगा | और सब मारपीट करने लगे | कहते हैं हम रंग नहीं खेलेंगे, मगर..मगर आप तो हमेश काका और ताऊ जी से रंग लगवाते हैं | इन्हें समझाइए न, कि ये भी हमारे साथ होली खेलें | ये हमारी टीम के सबसे उम्दा खिलाडी हैं | इन्हें समझाइए न चच्चा, प्लीज़…. प्रकाश की आँखे पनिया आईं |

ओप्फोह…अरे भाई तुम लोग हमारे लगा दो, बस | अब तो कोई शिकायत नहीं हैं, हाजी का वात्सल्य छलक गया | फिर, फिर तुम्हें भी तो सोचना चाहिए था कि उसका नया नया कुरता है |

नहीं अब्बू, बात कुरते कि नहीं थी, वो तो अम्मी धो देतीं | अच्छा, चलो मैं लगवा लेता हूँ, मगर मेरी एक शर्त है, मुझे सिर्फ हरा रंग ही लगाना | इद्दू का दुलार बाप के गमछे में लिपट गया |

क्यूं इद्दू ? हरा रंग ही क्यों बेटा ? हाजी की आँखों में रेत ही रेत भर गई |

इद्दू ने बड़ी मासूमियत से कहा, अब्बू हम मुसलमान हैं न |

रचनाकार-प्रदीप तिवारी ‘धवल’
9415381880

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