Skip to content

मदरसा

प्रदीप तिवारी 'धवल'

प्रदीप तिवारी 'धवल'

लघु कथा

November 3, 2017

फागुन महीने का तीसरा शुक्रवार | आज ही होलिका दहन होगा और कल रंग खेला जायेगा | पूरे गाँव में उल्लास और उत्साह का माहौल है | हर घर से गुझिया और नमकीन बनने की महक आ रही है | कहते हैं न, त्यौहार बच्चों कि आँखों में पलते हैं और उनके दैनिक व्यवहार में पनाह पाते हैं | समूचा गाँव बच्चा हो गया है और बच्चे पिचकारी | पूरे गाँव के रिश्ते फागुनी हो गए हैं, सभी मरद देवर हैं और सभी औरतें भौजाई | होली भाईचारे का त्यौहार है जहाँ धरम, जाति-बिरादरी, उंच-नीच, छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब सब पर बेलन चल जाता है और सभी एक समान हो जाते हैं | एक रंग में रंगा इंसान, दलित है या सामान्य, हिन्दू है या मुसलमान कोई नहीं पहचान सकता | गाँव की इसी रवायत को निभाते हुए इस साल भी पांच मन लकड़ी होलिका दहन के लिए मस्जिद की ओर से और पांच मन मंदिर की ओर से आ गई है | गाँव में बने नए नए मदरसे में हिन्दुओं ने जिस तरह से तन, मन, धन से मदद की उसकी मिसाल आस पड़ोस में दी जा रही है | घसवारी गाँव की गंगा-जमुनी तहजीब में ईद, मुहर्रम, दिवाली, दशहरा, होली सब गड्ड-मड्ड हैं |
जुमे कि नमाज़ अदा करके लौटते कल्लन, रईस, जावेद, इद्दू, शहजादे के चेहरे चमक रहे हैं, इन छोटे बच्चों का यह चौथा जुमा है | सफ़ेद कुरता पायजामा और गोल टोपी में दमकते इन बच्चों के साथ गाँव के रतन, किशुन, प्रकाश, कल्लू, नन्दू और जोरावर कबड्डी खेलने को आकुल हैं | ये गाँव की छोटी पार्टी की सबसे तगड़ी कबड्डी की टीम है | लेकिन ये सारे पूरी तरह से आज होली खेलने के मूड में हैं | और ये क्या किशुन ने इद्दू के कुरते पर रंग डाल दिया | होली है भाई होली है….

किशुन ! पगला गए हो का ? इद्दू का गेहुआं रंग लाल हो आया |

नहीं भाई होलिया गए हैं, नंदू ने चुटकी ली |

तुम तो चुप ही रहो नंदू, जावेद ने कालर पकड़ ली |

जानते नहीं तुम होली खेलना हमारे यहाँ हराम है | कल्लन हांफ रहा था |
रतन ने बीच बचाव किया तो उसे जोर का धक्का लगा |

मदरसे वाले मौलवी साहेब कहते हैं काफिरों के साथ रंग खेलने से आदमी दोज़ख में जाता है | शहजादे ने किशुन को थप्पड़ रसीदा |
वो देखो हाजी चच्चा आ रहे हैं, प्रकाश चिल्लाया तो सब रुक गए |

चच्चा…. चच्चा…., किशुन ने इद्दू को रंग लगा दिया तो वह लड़ने लगा | और सब मारपीट करने लगे | कहते हैं हम रंग नहीं खेलेंगे, मगर..मगर आप तो हमेश काका और ताऊ जी से रंग लगवाते हैं | इन्हें समझाइए न, कि ये भी हमारे साथ होली खेलें | ये हमारी टीम के सबसे उम्दा खिलाडी हैं | इन्हें समझाइए न चच्चा, प्लीज़…. प्रकाश की आँखे पनिया आईं |

ओप्फोह…अरे भाई तुम लोग हमारे लगा दो, बस | अब तो कोई शिकायत नहीं हैं, हाजी का वात्सल्य छलक गया | फिर, फिर तुम्हें भी तो सोचना चाहिए था कि उसका नया नया कुरता है |

नहीं अब्बू, बात कुरते कि नहीं थी, वो तो अम्मी धो देतीं | अच्छा, चलो मैं लगवा लेता हूँ, मगर मेरी एक शर्त है, मुझे सिर्फ हरा रंग ही लगाना | इद्दू का दुलार बाप के गमछे में लिपट गया |

क्यूं इद्दू ? हरा रंग ही क्यों बेटा ? हाजी की आँखों में रेत ही रेत भर गई |

इद्दू ने बड़ी मासूमियत से कहा, अब्बू हम मुसलमान हैं न |

रचनाकार-प्रदीप तिवारी ‘धवल’
9415381880

Author
प्रदीप तिवारी 'धवल'
मैं, प्रदीप तिवारी, कविता, ग़ज़ल, कहानी, गीत लिखता हूँ. मेरी दो पुस्तकें "चल हंसा वाही देस " अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद और "अगनित मोती" शिवांक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी हैं. अगनित मोती को आप (amazon.in) पर भी... Read more
Recommended Posts
इंसानियत से इंसान पैदा होते है !
एक बूंद हूँ ! बरसात की ! मोती बनना मेरी फिदरत ! गर मिल जाए, किसी सीपी का मुख खुला ! मनका भी हूँ... धागा... Read more
आहिस्ता आहिस्ता!
वो कड़कती धूप, वो घना कोहरा, वो घनघोर बारिश, और आयी बसंत बहार जिंदगी के सारे ऋतू तेरे अहसासात को समेटे तुझे पहलुओं में लपेटे... Read more
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है मगर छन भी आती कहीं रोशनी है न करती लबों से वो शिकवा शिकायत मगर बात नज़रों से... Read more
निकलता है
सुन, हृदय हुआ जाता है मृत्यु शैय्या, नित स्वप्न का दम निकलता है। रोज़ ही मरते जाते हैं मेरे एहसास, अश्क बनकर के ग़म निकलता... Read more