कविता · Reading time: 1 minute

मत पढ़ो अखबार

मत पढ़ो अखबार पढ़ पाओगे क्या
शत्रु पर एतबार कर पाओगे क्या
बाप ने बेटी से मुँह काला किया
वह मुई लाचार ,पढ़ पाओगे क्या
लोभियों ने फूल सी बेटी जला दी
रो रहा परिवार पढ़ पाओगे क्या
बाप को मारा कि विधवा माँ हुई
पुत्र ही गुनहगार पढ़ पाओगे क्या
चार बच्चे छोड़ निज प्रेमी के साथ
महिला हुई फरार पढ़ पाओगे क्या
देखती है आँख जो वह सच नहीं
शक में है किरदार पढ़ पाओगे क्या
आदमी के ख्वाब मिट्टी में मिले
छद्म की सरकार पढ़ पाओगे क्या

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