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मज़दूर हूँ ……

Brijpal Singh

Brijpal Singh

कविता

November 24, 2016

मज़दूर हूँ …….
और मज़बूर भी
वो दिहाडी और
वो कमाई …….
मेरे खाने तक सीमित
और …….
कुछ बचाने तक मात्र
ताकि कर सकूँ
दवा पानी बच्चों की
गर … सर्द ज़ुकाम
हो जाये कभी
सच कहूँ …. तो
जि़दगी-ए-जिंदगी को मैंने
आत्मसंतोष को मैंने
जीवन का लक्ष्ये बनाया
चिथडे-फटे कपडो में
सूट पहनने का सुख पाया
इक जून की रोटी जब
होती नहीं नसीब
किसी रोज़ …
करके उधार सारा …….
करता हूँ
बच्चों का गुज़ारा
न दुनिया …….
न रिश्तेदार कोई
न ही दोस्तर वेगरह
इसीलिए कहता हूँ
मज़दूर हूँ…….
और मज़बूर भी ।।

Author
Brijpal Singh
मैं Brijpal Singh (Brij), मूलत: पौडी गढवाल उत्तराखंड से वास्ता रखता हूँ !! मैं नहीं जानता क्या कलम और क्या लेखन! अपितु लिखने का शौक है . शेर, कवितायें, व्यंग, ग़ज़ल,लेख,कहानी, एवं सामाजिक मुद्दों पर भी लिखता रहता हूँ तज़ुर्बा... Read more
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