गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

मजबूर ज़िंदगी

ज़िंदगी ने किस मोड़ पर लाकर मुझको छोड़ा है ।
चारों तरफ से जुल्म औ तश़्द्दुत ने मुझे घेरा है ।
गैरों से क्या अपनों से मैंने फ़रेब खाए हैं ।
हर पल बढ़ते अल़म और खौफ़ के साए हैं ।
दिखता नहीं मुझे कोई हमद़र्द यहाँ ।
नजर आते हैं मुझे सिर्फ खुदगर्ज़ यहाँ।
बिक रहे हों ज़मीर औ ईम़ान चंद टुकड़ों में जहाँ ।
कैसे करूं इंसाफ़ की उम़्मीद मैं वहाँ ।
इन चोरों की ज़मात में जो हाक़िम बना बैठा है वो सबसे बड़ा चोर है ।
उसके इश़ारों पर सब नाचते हैं उसका बड़ा सिय़ासी ज़ोर है ।
जहाँ लूट लूट कर ऱसूख़दार अपना घर भर रहे हैं ।
वहीं बेब़स लाचार ग़रीब भूख से तड़प तड़प कर अपना दम़ तोड़ रहे हैं ।
मैंने अच्छे दिन फिरने की आस लगाना अब छोड़ दिया है ।
मजबूर ज़िंदगी को उसके हाल पर छोड़ दिया है ।

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