कविता · Reading time: 2 minutes

मजदूरों की किसी ने नहीं सुनीं

सारे कवियों ने कविताएं बुनी
पर मजदूरों की किसी ने नहीं सुनीं

यें राहतें ये पैकेज किस काम आएगें
मुझे नहीं लगता ये पैसै मजदूरों को मिल पाएंगें

दो महीनो से लगी हुई है लाखों करोड़ो की धुनी

पर मजदूरों की किसी ने नहीं सुनीं

रेल की पटरियों पर मजदूरों का खून था
उसे देख कर हर एक देशवासी के सिर पर जनून था
और पास में पडी थी रोटी एक खून से सनी

मजदूरों की किसी ने नहीं सुनी

रोज देखती हूं मजदूर कैसे रो रहे है
अपनी व्यथा कह कर देश के “विकास” का दामन धो रहे है
कैसे छोटे छोटे बच्चे सड़क़ो पर सोए हुए है
और देश की अन्यायपूरण व्यवस्था को ढ़ो रहे है
और दूसरी तरफ पालघर में मारे ग ए है ऋषि और मुनि

और इधर मजदूरों की किसी ने नहीं सुनी

अमीरों के बच्चों के लिए केक का इंतजाम हो गया
गरीब का बच्चा तड़प तड़प कर भूखा ही सो गया
कुछ बच्चे पैदल चलते चलते रास्ते में ही मर ग ए
आप के सारे पैकेज धरे के धरे रह ग ए
पता नहीं सरकार ने मजदूरों की मदद के लिए कौन सी राह है चुनी

देख लो तुम मजदूरों की किसी ने नहीं सुनीं

विदेशो में जाने वालों का भी इंतजाम हो गया
विदेशों से आने वालों का भी आगमन हो गया
पर देश के मजदूरों के लिए रेलगाड़ी बड़ी देर से चली

क्योंकि मजदूरों की किसी ने नहीं सुनी

कैसा समाज है ये
सभ्य हैं या सड़ा हुआ
अब तो कोई बुदिजीवी और लेखक मोमबती लेकर नहीं खड़ा हुआ
अब कोई चिंतन और मनन नहीं है
क्या ये मानवाधिकारों का हनन नहीं है

मजदूरों के लिए हर तरफ हाहाकार हो गया
पर कहीं कोई बात नहीं बनी

मजदूरों की किसी ने नहीं सुनी
मजदूरों की किसी ने नहीं सुनी।

3 Likes · 74 Views
Like
24 Posts · 2.6k Views
You may also like:
Loading...