कविता · Reading time: 2 minutes

मकान की यादे

मकान का बाहरी कमरा जहाँ दादा जी रहते थे|
ना जाने सोते थे कब, बस जागते रहते थे
पिताजी डाँटते थे जब भी मुझे दादा जी बचाते थे
तुझसे कम सैतान है पापा से कहते थे
कमरे के बीच मे तखत पर दादा जी और उनकी छड़ी रहती थी
दाई तरफ दीवार मे एक दराज मे एक घड़ी रहती थी
दादाजी थे तो घर पर ,लगता था हमेशा एक पहरा था
रिश्तो को संजोये रखने का,हुनर उनके पास गहरा था
अब तो वहाँ बस उनकी तस्वीर और कुछ याद रहती है
जिसमे चेहरे की चमक कुछ धूल से धुंधली सी हो गयी है
कभी पापा साफ करते है कभी हवा साफ कर जाती है
घर मे कोई और तो बात नही करता
लगता है हवा ही दादाजी से कुछ बात कर जाती है ||

सुबह वो उसका ची-2 करके सबको उठा जाना
ज़रा सी आहट होने पर फुर्र से उड़ जाना
मकान के आँगन मे चिड़िया एक घोसला बनाती थी
दिन भर दाना चुंगती, नन्हे बच्‍चों को चुगांती थी
पर अब चिड़िया ने खुद को आँगन मे आने से रोक लिया है
क्यो की घर के आगन को उपरी मंज़िल की छत ने ढक लिया है
मकान की उपरी छत पर कुछ किरायेदार रहते है
जिनसे अब कुछ किराया और कुछ शोर आता है||

मकान का वो कमरा जहाँ पढ़ा करता था मै और भाई
किताब कापियो के अलावा वहाँ दिखता नही कोई
किताबो की जगह अब कम्प्यूटर तन्त्र ने लेली
पहले विधयालय नही जाते थे किताबो के बहाने से
अब बड़े-२ काम हो जाते है एक क्लिक दबाने से||

आज किताबो को पलटा मैने धूल हटाने के बहाने से
सूखा गुलाब निकला जो अमानत था किसी की एक जमाने से
किताबो के पन्नो पर जिनका नाम लिख रखा था
अब वो नाम काम आते है लॅपटॉप का पासवर्ड बनाने मे

जब किताबो की जगह ई-बुक ने ले ली
तो सोचता हूँ की इन सब किताबो का क्या होगा
हर पन्ने मे दफ़न कोई याद,ख्वाबो का क्या होगा
किताबो मे छिपी कहानियो के फरिस्तो का क्या होगा
किताबे माँगने गिरने उठाने के बहाने जो रिस्ते बनते थे अब उन
रिस्तो का क्या होगा||
© शिवदत्त श्रोत्रिय

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