मकरंद

गुंजित सुमनों के अधर,जब नेहों के छंद।
केसरिया के रंग से, झड़ते हैं मकरंद।। १

कवि वसंत पर लिख रहे, कविता दोहा छंद।
हर्फ – हर्फ में है भरी, मीठा सा मकरंद।। २

कागज पर झरने लगे, भावों के मकरंद।
अब अपने मन की लिखूँ, प्यारे-प्यारे छंद।। ३

घर महकाती पुष्प-सा, बेटी वो मकरंद।
उसकी हर मुस्कान से, बहती सरिता छंद।। ४

नवल सृजन मकरंद है, जीवन का आधार।
नर-मादा के बीच में, भर देता है प्यार।।५

ऋतु वसंत का आगमन, चहुँ दिश है आनंद।
नव पल्लव खिलने लगे, फूलों में मकरंद।।६

जब से फूलों में भरा, प्यारा-सा मकरंद।
मधुप मधुर प्याला लिए, घूम रहा स्वच्छंद।।७

भ्रमर गीत गाने लगे, प्रणय नेह का छंद।
पुष्प समर्पण भाव से, लुटा दिया मकरंद।। ८

चुम- चुम कर मकरंद अलि, ले जाता रस गंध।
मगर पुष्प हँसती रही, सदियों का अनुबंध।। ९

हृदय पटल मन पुष्प में, मधु रस का भंडार।
महकाते मकरंद सा, ये मधुकर रस धार।।१०

बीज कोश में गंध भर, कहलाया मकरंद।
वन-उपवन महका दिया, छाया नव आनंद।।११

चहुँ दिश भर देती महक, चले पवन जब मंद।
पर उपकारी ये पवन, ले जाती मकरंद।। १२
-लक्ष्मी सिंह

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