मंज़र

मंज़र
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ज़िंदगी में मंज़र बदलते हर दौर को हमने देखा है
इम्तेहाने ज़िंदगी में अपनों को पराया होते देखा है

चौतरफ़ा पसरा अंधेरा ही उदासी का सबब नहीं है
उजाले में अक्सर अपने साये को लड़खड़ाते देखा है

भटकते रहे कुछ राहों पर ताउम्र पाने को मंज़िल
उन्हे उन राहों पर ही तन्हाई में दम तोड़ते देखा है

उठ चुका है जनाज़ा जज़्बात का इंसानों की बस्ती में
बुतों को ही यहां हमने अक्सर आंसू बहाते देखा है

हिस्सा होता है ‘ सुधीर ‘ हर शख़्स जमाने में भीड़ का
छंटते ही भीड़ उसे अपना वजूद तलाश करते देखा है..

— सुधीर केवलिया

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