कविता · Reading time: 2 minutes

…………………………..मंडियां!!

देखा है मैंने भी कभी,
मंडियों को लगते हुए,
बचपने में होके उत्सुक,
जाते थे हम दौड़े हुए,

आज गांव के तप्पड में,
बैलों की मंडी लगने को है,
बैलों को बेचने वालों का,
अंदाज बयां देखने को है,

सुंदर-सुंदर जोड़ियां,
बैलों की होती वहां,
कोई छोटे कद की होती,
कोई मंझोली जोड़ियां,
कोई ऊंचे डील डौल की,
घंटियों से लदी हुई जोड़ियां,

इसी तरह से,
लगती रही हैं,
अन्य पशुओं की,मंडियां,
हम भी जाकर देख आते,
भांति-भांति की मंडियां,

थोड़े हुए जो हम बड़े,
तो अब जाने लगे हम मंडियां,
कभी बैलों की खरीद को,
कभी गाय-भैंस को,
खरीदने को मंडियां,

खेती-किसान काम था,
मंडियों में आना जाना आम था,
कभी बीजों को खरीदने,
और कभी अपनी उपज को बेचने,
मंडियों से जींदगी का,
जुड़ा होना, सुबह-शाम था,

बरसों हुए हमें देखे हुए,
अब नहीं सजती बैलों की मंडियां,
नाही लगती है अब अन्य पशुओं की,
अपने गांवों में मंडियां,
खाद बीज को भी अब नहीं जाना पड़ता है मंडियां,
किन्तु अपनी उपज को बेचने तो, जाना ही पड़ता है मंडियां,

बस इतना ही सरोकार रह गया है,
अब तो अपना मंडियों से जुड़ा हुआ,
जो पैदा किया है जिस फसल को,
ले जाते हैं हम अब भी मंडियों में बेचने को,

पर अचानक कुछ समय से,
अब हमारी मंडियों में,
वह रौनक है बची नहीं,
दाम भी मिलते नहीं,
हमको उपज के अब सही,
किसान की मजबूरियों का,
है यहां पर जमघट लगा,
उपभोक्ता को भी नहीं,
मिल रहा है, इसका कोई फायदा।

इस बीच के दलालों ने,
ऐसा शीषटम है बना दिया,
अब तो मंडियों में इनका ही सिक्का चल रहा,
ऐसे ही कुछ दलालों ने अब,
ऐसी-ऐसी और मंडियां लगा दी है,
जहां पर अब इंसानों की भी बोली लग रही है,
इंसान भी यह मामूली नहीं हैं,
माननीय इनके साथ है जुड़ा,
लग रही हैं बोलियां,
आम आदमी हतप्रभ है खड़ा।

बना दिया है जनता ने जिस को,
इन्हें इससे है क्या पड़ा,
अपने-अपने स्वार्थों से ही,
इनका अपना हित जुड़ा,
क्या जमाना आ गया है,
आदमी भी है बिक रहा,
सामंतवाद में ही थी,
पहले तो ऐसी-ऐसी क्रूप्रथा,
दासों की भांति हैं खरीदे और बेचे जा रहे,
पढ़ें-लिखे इंसान भी,
अब दासों की भांति बिक रहे।

अब वक्त आ गया है,
ऐसी मंडियों से मुक्ति का,
बिक रहे हैं जो, करोड़ों रुपयों के लिए,
हिसाब उनसे लीजिए,
जिन्हें वोट आपने थे दिए,
किसी निर्दलीय को तो हर कोई चाहता नहीं,
पार्टीयों पर थी आस्था, तो उसके ही चिंन्ह पर वोट दिये,
अब यह हमारे वोट को किस हैसियत से हैं बेच रहे,
इनको वहां तक हम ही तो पहुंचाये है,
यह हमारी नुमाइंदगी को वहां बेच खाये है,
पार्टीयों ने भी तो ऐसे बिकाऊओं पर दांव लगाया है,
निष्ठा वान कार्यकर्ताओं से मुंह चुराया है,
बस जीतने की हैसियत के झांसे में आए हैं,
और जीतकर आ गये तो, अब मंडियां सजाए हैं।

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