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भ्रूण हत्या

Manju Bansal

Manju Bansal

कविता

September 19, 2017

माँ! मुझे मत मारो
अपनी कोख के नूर को
इस तरह स्वयं से जुदा न करो।
चंद लम्हे ही तो हे हैं
जहाँ में आँखें खोले मुझे
बेटी हूँ इसलिये से दंश
झेलना पड़ रहा मुझे ।
मैं कोई गुनहगार नहीं
तुम्हारे ऊपर बोझ भी नहीं ।
अपने दामन में समेटा तो होता मुझे
अपने वात्सल्य व ममता से
सींचा तो होता मुझे ।
शायद तेरी उम्मीदों पर मैं खरा उतरती
और तुम्हारी बेटे की चाह को
बेटा बनकर पूरा करती
बेटा बनकर पूरा करती ।।

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Author
Manju Bansal

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