भैया

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दूर होकर भी पास,
मुलायम दुब पर
शबनमी एहसास हैं भैया ।
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छलके मेरी आँखों में,
यादों के झरोखों में,
बसा संसार है भैया ।
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सारी खुशियाँ जिसमें मिल गए,
पंखुड़ी – पंखुड़ी सहेजे गए,
सतत् व्यवहार हैं भैया ।
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रूठे भी तो मुकर जाते हैं,
जो टूटे तो बिखर जाते हैं,
फूलों का ऐसा पराग हैं भैया ।
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बेवजह रूठना,
खुद ही मान जाना,
कभी गुस्सा, तो
कभी प्यार हैं भैया ।
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ये बंधन नेह से भरा,
कच्चे – धागे सूत का,
राखी का त्योहार हैं भैया ।
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मधुर, पावन, निश्छल,
माँ के मन सा कोमल,
पिता सा दुलार हैं भैया ।
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—लक्ष्मी सिंह ???

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