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भैंस का दर्द! (एक गंभीर कविता)

Neeraj Chauhan

Neeraj Chauhan

कविता

July 19, 2017

धार्मिक अनुष्ठानों और तीक्ष्ण कानूनों से,
गाय तो हो गयी हैं ‘राष्ट्रमाता’
पर मेरा क्या?
फिरी सत्ताधीशो की नज़रे
वह हो गयी भाग्य विधाता
पर मेरा क्या?

सिर्फ वही नही
उसका संपूर्ण गौवंश
उतरा है खरा,
पवित्रता के सभी मानदंडों पर
अब उनकी हत्या पर
इंसानों जैसी ही सजा हैं
पर मेरा क्या?
गाय से कोई मतभेद नही है मेरा
वरन शिकायत हैं मुझे
इस निर्मम व्यवस्था और समाज से,
जिसने जी भर पीया हैं मेरा दूध
पर मुँह फेर लेते है
मुझ पर गिरने वाली गाज से
मुझेमे और तुममे बस फ़र्क़ इतना है
की तुम श्वेतवर्णी हो
मैं काली हूँ
सौभाग्यशाली हो तुम,
की कटने से बच गयी हो..
धन्य हैं तुम्हारा जन्म.. तुम्हारा गौवंश

पर अफ़सोस
मुझ पर मजाक बनना रहेगा तब तक जारी
जब तक मैं गौरी नही हो जाती
चलती रहेगी मुझ पर आरी
हमेशा की तरह
क्योंकि मैं निरी पशु हूँ
तुम माता हो?

एक विनती हमेशा करुँगी
विधाता से
की मुझे तुम्हारी ही कोई रिश्तेदार बना दे
की तुम्हारी कुछ छाया मुझ पर आ सके
तुम्हारी तरह बच सके मेरा वंश भी
वहशियों की आरी चलने से.. .

– ©नीरज चौहान

Author
Neeraj Chauhan
कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।
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